Sunday, October 29, 2006

ना लिख पाऊंगा हर्फ़-ए-इश्क तुझको मैं कभी,
सोचा लिख देता हूं कोई एक ग़ज़ल ही सही


तेरा साथ ना हुआ हासिल तेरी यादें ही सही,
तेरा हाथ न है हाथ में, तेरा एहसास ही सही

बारिश की राह तकती आंख में भर गये आंसूं,
गूंजते बादलों के साथ वो अकेली शाम ही सही

क्या बात अगर तुझे कभी पा न सकूंगा मैं
तेरे आशिकों कि शुमार में मेरा नाम ही सही

आंखें न देख सकती तुझे, न ये कान सुनते हैं,
"तू है, यहीं कहीं" दिल में ये एक खयाल ही सही

माना मेरे नसीब में नही है तेरे लब का जाम
तेरी जुबां पे उस रोज आया हुआ मेरा नाम ही सही

न बन सका तेरा आशिक, तेरा मजनू, तेरा बालम
तेरे चाहनेवालों में से मैं एक कोई 'बेनाम' ही सही

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